Thursday, October 22, 2026
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मानसून मॉक ड्रिलः उत्तराखण्ड में आपदा प्रबंधन तंत्र का हुआ परीक्षण

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हमारे संवाददाता
देहरादून। मानसून सीजन को देखते हुए उत्तराखंड में राज्य स्तरीय मानसून मॉक ड्रिल आयोजित की गई। इस दौरान भूस्खलन, बादल फटने, नदी का जलस्तर बढ़ने और जलभराव जैसी काल्पनिक आपदा परिस्थितियां तैयार कर विभिन्न विभागों की त्वरित प्रतिक्रिया, राहत एवं बचाव कार्यों तथा आपसी समन्वय का परीक्षण किया गया।
मानसूनी सीजन को देखते हुए आज राजधानी देहरादून सहित राज्य के कई जिलों में आज आपदा प्रबन्धन तंत्र की तैयारियों को परखा गया। इस क्रम में आज सुबह 9.15 बजे सतपुली क्षेत्र में भूस्खलन होने और 20 से 25 लोगों के फंसे होने की सूचना प्रसारित की गई। इसके बाद राहत एवं बचाव दल को तत्काल मौके पर भेजा गया। वहीं 9.20 बजे थलीसैंण क्षेत्र में बादल फटने और 25 लोगों के फंसे होने का परिदृश्य तैयार किया गया, जहां जिला प्रशासन, एसडीआरएफ और पुलिस की टीमों ने संयुक्त रूप से राहत एवं बचाव अभियान का अभ्यास किया।
मॉक ड्रिल के दौरान कोटद्वार के सिंबलचौड़ में नदी का जलस्तर बढ़ने की सूचना जारी कर स्थानीय लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने की चेतावनी दी गई। वहीं फरासू में भूस्खलन और अलकनंदा नदी का जलस्तर बढ़ने से धारी देवी स्थित गोवा बीच के पास राष्ट्रीय राजमार्ग के जलमग्न होने का परिदृश्य तैयार किया गया। अभ्यास के दौरान थलीसैंण में एसडीआरएफ और पुलिस टीम ने तीन लोगों का सफल रेस्क्यू किया। घायलों को 108 एंबुलेंस की मदद से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भेजकर उपचार की प्रक्रिया का भी अभ्यास किया गया। वहीं धारी देवी के पास गोवा बीच क्षेत्र से भी तीन लोगों को सुरक्षित निकालकर प्राथमिक उपचार उपलब्ध कराया गया।
मॉक ड्रिल के दौरान टीएचडीसी की ओर से टिहरी बांध से पानी छोड़े जाने का काल्पनिक परिदृश्य तैयार किया गया। इसके तहत देवप्रयाग, मालाकुंड और लक्ष्मणझूला क्षेत्रों को अलर्ट जारी करने और संबंधित एजेंसियों के बीच समन्वय स्थापित करने की प्रक्रिया का परीक्षण किया गया। वहीं चम्पावत जिले में आयोजित मॉक ड्रिल के दौरान अतिवृष्टि से उत्पन्न आपदा की स्थिति का अभ्यास किया गया। राष्ट्रीय राजमार्ग अवरुद्ध होने, पूर्णागिरि राज्य मार्ग क्षतिग्रस्त होने तथा टनकपुर और बनबसा क्षेत्रों में जलभराव की स्थिति दर्शाई गई। राज्य के शासन—प्रशासन ने स्पष्ट किया कि यह केवल एक मॉक ड्रिल थी, जिसका उद्देश्य वास्तविक आपदा की स्थिति में विभिन्न विभागों की त्वरित प्रतिक्रिया, राहत एवं बचाव व्यवस्था, संसाधनों की उपलब्धता और आपसी समन्वय का परीक्षण करना था, ताकि मानसून के दौरान किसी भी आपदा से प्रभावी ढंग से निपटा जा सके।

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