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आपदा पीड़ित आखिर जाएं तो जाएं कहाँ?

  • केंद्रीय टीम से की पीड़ितों ने विस्थापन की मांग
  • गंगोत्री—यमुनोत्री धामों का सन्नाटा कब टूटेगा
  • 100 से अधिक गांवों का संपर्क टूटा, खाने के पड़े लाले

देहरादून। मानसूनी आपदा का कहर झेल रहे पहाड़ के लोगों का दर्द इतना अधिक गंभीर मुद्दा है कि उसे दूर करना तो दूर की बात है सुन पाना भी मुश्किल है। आपदा पीड़ितों को हुए नुकसान का जायजा लेने आई केंद्र की टीम ने आज बागेश्वर के उन गांवों का दौरा कर उनकी समस्याओं को समझने की कोशिश की जिनका इस आपदा में सब कुछ खत्म हो गया है। गांवों के लोगों का कहना है कि वह अब यहां नहीं रह सकते इसलिए सरकार उनके पुनर्वास की व्यवस्था करें?
वैसे ही स्थिति दूसरे आपदा ग्रस्त गांवों की भी है। रुद्रप्रयाग के वासु केदार क्षेत्र के ताल जामण गांव पर पहाड़ी से पत्थरों की बरसात हो रही है, लोग दहशत में है। बीते 5 अगस्त से गंगोत्री धाम में तथा बीते 15—16 से यमुनोत्री धाम में एक भी यात्री नहीं पहुंच सका है। गंगोत्री और यमुनोत्री हाइवे के पूर्णतया बाधित होने के कारण लगभग 100 गांवों का संपर्क मुख्यालय से टूटा हुआ है जिसके सुचारू होने की अभी भी कोई संभावनाएं दिखाई नहीं दे रही है। इन गांवों में जरूरी सामान की सप्लाई भी नहीं हो पा रही है। बिजली, पानी का संकट अलग है। सवाल यह है कि इस हालात में यह लोग कितने समय तक गुजारा कर सकते हैं।
पुनर्वास और विस्थापन की बात कहना जितना आसान है उसे 100 गुना ज्यादा मुश्किल काम है। राज्य भर में 350 से अधिक गांवों को विस्थापन की जरूरत है, हर साल इनकी संख्या बढ़ती ही जा रही है। गांवों का विस्थापन लोगों को कहीं भी घर बनाकर देने तक सीमित नहीं है। उनका काम धंधा और जमीन जायदाद तथा आजीविका से भी जुड़ा हुआ सवाल है। इसलिए यह चुनौती और भी गंभीर है।
इस मानसून काल में सर्वाधिक प्रभावित जिला उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग व चमोली है। जिनमें आपदा से भारी नुकसान हुआ है। वैसे तो पूरा उत्तराखंड ही आपदा का हॉटस्पॉट बन चुका है। लाखों की संख्या में प्रभावित इन लोगों की केंद्र सरकार व राज्य सरकार भी कितनी मदद कर पाएगी अलग बात है। लेकिन इन आपदा पीड़ितों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि वह आखिर जाए तो जाए कहां? और करें तो करें क्या?

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